मंगलवार, 4 अगस्त 2015

भगवान शिव सर्वव्यापक हैं


पंच तत्त्वों में व्यक्तः
भगवान शिव सर्वव्यापक हैं। दक्षिण भारत में भगवान शिव की सर्वव्यापकता को व्यक्त करने के लिए उन्हें जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश इन पाँचों तत्त्वों में व्यक्त किया गया है। इस दृष्टि से तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली में जल या नीर(जंबूकेश्वरार या जम्बूकेश्वर), तिरुअन्नामलै में अग्नि (अन्नामलियार या अरुणाचलेश्वर), कांचिपुरम में पृथ्वी (एकंबरेश्वर), चिदंबरम् में आकाश (नटराज), तथा आंध्र प्रदेश में तिरुपति से 36 किलोमीटर की दूरी पर श्री कालहस्ति में वायु (श्री कालहस्तीश्वर स्वामी) के शिव मंदिर प्रसिद्ध हैं।
तिरसठ (63) शिवभक्त नायनारोंया नायनमारोंके साहित्य में प्रसिद्ध शैव मंदिरों का वर्णन मिलता है जिनकी संख्या 264 है।
रामेश्वर के रामलिंगेश्वर के अतिरिक्त निम्न विश्व प्रसिद्ध शैव मंदिर हैं -
(1) एकंबरेश्वर एवं (2) कैलाश नाथरः कांचीपुरम् में
(3) अन्नामलियार या अरुणाचलेश्वरः तिरुअन्नामलै में
(4) जम्बूकेश्वरः तिरुचिरापल्ली में
(5) बृहदेश्वर या राजराजशेखर या पेरुवयुदियारः तंजावुर में
(6) अधि कुंबेश्वरः तंजावुर से 45 किलोमीटर दूर कुंबकोनम् में
(7) ऐरावतेश्वरः तंजावुर जिले में कुंबकोनम् के पास
(8) संगमेश्वरः इरोड जिले में भवानी में
(9) मीनाक्षी-सुन्दरेश्वरः मदुरै में
(10) पापनासम् रेलवे स्टेशन के चतुर्दिक शिव-मंदिर-समूहः तिरुनलवेली के पास
(11) नटराज शिव मंदिरः चिदंबरम् में
इनके अतिरिक्त कोयंबतूर जिले के (12) ध्यानलिंग मंदिर की भी अपनी विशिष्ट पहचान है तथा
चेन्नई के (13)कपिलेश्वर एवं (14) मरुंदीश्वरार मंदिर भी उल्लेखनीय हैं।
(2) आंध्र प्रदेशः
श्री सैलम-मल्लिकार्जुन तो ज्योतिर्लिंग है ही; निम्न मंदिर भी उल्लेखनीय हैं :
(क) रायलसीमा क्षेत्रः
(1) श्री कालहस्तिः चित्तूर जिले में स्वर्णमुखी नदी के तट पर। (2) पल्लि कोण्डेश्वरः चित्तूर जिले में ही। (3) जगन्नाथ गट्टूः कर्नूल शहर के पास।(4) जगन्नाथ गट्टूः कर्नूल शहर के पास। (5) वीरभद्रः अनंतपुर के पास।
(ख) तेलंगाना क्षेत्रः
(6)कालेश्वरम् : करीमनगर जिले में करीमनगर शहर से 125 किलोमीटर दूर।(7) वेमुलनाडः इसकी पहचान दक्षिण की काशी के रूप में भी होती है। करीमनगर शहर से 35 किलोमीटर दूर (8) कीसरगुट्टाः रंगारेड्डी जिलें में हैदराबाद से लगभग 40 किलोमीटर दूर
(3) कर्नाटकः
(क) पुरानी मद्रास रेज़ीडेंसीः
(1) श्री मंजुनाथेश्वरः धर्मस्थल।(2) श्री कदरी मंजुनाथः मंगलौर में।(3) श्री महालिंगेश्वरः मंगलौर से 52 किलोमीटर दूर पुत्तूर में।
(ख) पुराना बम्बई सूबाः
(4) महाबलेश्वरः उत्तर कन्नड जिले के गोकर्ण शहर में।(5) मुरुदेश्वरः उत्तर कन्नड जिले की भटकल तहसील के कस्बे में अरब सागर के तट पर। लेखक ने कर्नाटक में जिन मूर्तियों के दर्शन किए हैं, उनमें सर्वाधिक ऊँची, भव्य एवं चित्ताकर्षक प्रतिमाएँ दो हैं : (क) श्रवणबेलगोल नगर में जैन धर्म के भगवान गोम्मटेश बाहुबली की प्रतिमा (ख) इस मंदिर के बाहर नव-निर्मित शिव प्रतिमा। (6) कुंडलसंगमः बासवेश्वर के वीरशैव या लिंगायत संप्रदाय का प्रधान केंद्र। बासवेश्वर-समाधि के अतिरिक्त स्वयंभू लिंग। बागलकोट जिले के अल्माटी बाँध से लगभग 15 किलोमीटर दूर। (7) अर्द्धनारीश्वर, (8) 18 भुजाओं वाले नटराज एवं (9) भूतनाथः ये तीनों बीजापुर जिले में बादामी नगर में। (10) मल्लिकार्जुन मंदिर समूहः बीजापुर जिले में बादामी के पास पट्टाडकल में।(11) महादेवः कोप्पल जिले के यालबुर्गा ताल्लुका के पास इतगी गाँव में।(12) सोमेश्वर मंदिर समूहः गडक जिले के शिरहट्टी ताल्लुका में लक्ष्मेश्वर में।(13) सिद्धेश्वरः हवेरी जिले के हवेरी नगर में।
(ग) पुराना मैसूर राज्यः
(14) श्री कांतेश्वरः मैसूर से 23 किलोमीटर दूर ननजनगुड में, जिसे दक्षिण की काशी की माना जाता है। । (15) भोगानंदीश्वर, (16) उमा-महेश्वर एवं (17) अरुणाचलेश्वरः ये तीनों बंगलुरु से 60 किलोमीटर दूर नंदी हिल्स पर।(18) विरूपाक्षः बेल्लारी जिले में तुंगभद्रा नदी के तट पर हंपी में।(19) कोटिलिंगेश्वरः कोलार जिले में। इसे विश्व का सबसे बड़ा लिंग माना जाता है।
(4) केरलः
(1)अलुवा का शिव मंदिरः एर्नाकुलम् जिले में कोची से लगभग 20-21 किलोमीटर दूर अलुवा में पेरियार नदी और सहायक नदी मंगलापुझा के बीच स्थित शिव लिंग। महाशिवरात्रि के अवसर पर बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। (2)थिरुवलूर महादेवः एर्नारुलम् जिले में। (3) कवियूर महादेव एवं (4) थिरिप्पारा शिवः दोनों पथनामथीटा जिले में (5) आनन्देश्वरम् : अलप्पुजा जिले में (6) वामटपल्लै महाशिवः कोट्टायम जिले में। (7) वडक्कुमनाथः त्रिचूर में स्थित।(8)शिव मंदिरः त्रिचूर जिले में पोनकुन्नम् में। (9) राजराजेश्वरः कन्नूर जिले में।
(5) मध्य प्रदेशः
महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर के अतिरिक्त निम्न मंदिर उल्लेखनीय हैः(1) कंदरिया महादेवः (खजुराहो)।(2) जटाशंकरः होशंगाबाद जिले के पचमढ़ी में।(3) शिव मंदिरः (खरगौन(पश्चिमी निमाड़) जिले के चोली में)।(4) केदारेश्वरः शिवपुरी जिले के पोहरी में।(5) गुप्तेश्वरः हरदा जिले के चारुवा गाँव में।(6) पशुपतिनाथः मंदसौर में।(7) भोजपुर का मंदिरः भोपाल से 28 किलोमीटर दूर।
(6) छत्तीसगढ़ः
(1) भोरमदेवः कबीरधाम जिले में कवर्धा से 18 किलोमीटर दूर चौरागाँव में।(2) शिव-शक्तिः दुर्ग जिले के अमलेश्वर नगर में माँ पीताम्बरा बगलामुखी मंदिर में शिव-शक्ति एवं भैरव की प्रतिमाएँ हैं।(3) कपिलेश्वर शिव मंदिर समूहः दुर्ग जिले के बालोद में।(4)कुलेश्वरः रायपुर से दक्षिण दिशा में 45 किलोमीटर की दूरी पर राजिम नगर में।(4) कालेश्वरनाथः जांजगीर-चाम्पा जिले के जांजगीर मुख्यालय से 11 किलोमीटर दूर पीथमपुर में।
(7) उत्तराखंडः
केदारनाथ, जागेश्वर एवं मोटेश्वर ज्योतिर्लिंगों के अलावा निम्न मंदिर भी उल्लेखनीय हैं।
(क) कुमाऊँ क्षेत्र में :
(1) बालेश्वर महादेवः चंपावत जिले में।
(ख) गढ़वाल क्षेत्र में :
(2) गोपेश्वर या गोपीनाथः चमोली जिले में गोपेश्वर शहर में।(3) पुराना विश्वनाथ मंदिरः रुद्रप्रयाग जिले के गुप्त काशी में।(4)तुंगनाथः पंचकेदार के केदारनाथ के अतिरिक्त कल्पेश्वर, रुद्रनाथ, तुंगनाथ एवं मध्यमहेश्वर हैं। तुंगनाथ का महत्व अधिक है। रुद्रप्रयाग जिले के चोपता से 4 किलोमीटर दूर।(5) कमलेश्वर महादेवः गढ़वाल की प्राचीन राजधानी श्रीनगर में। (6) दक्षेश्वर महादेव मंदिरः हरिद्वार से 4 किलोमीटर दूर कनखल में।(7) नीलकंठ महादेव मंदिरः ऋषिकेश से 32 किलोमीटर दूर।
(8) हिमाचल प्रदेशः
बैजनाथ ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त निम्न मंदिर, पर्वत, सरोवर आदि की मान्यता भी हैः (1) मणि-महेश-कैलाशः चम्बा जिले के भरमौर के अन्तर्गत धौलाधार, पांगी एवं जास्कर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच कैलाश पर्वत एवं मणि-महेश सरोवर की मान्यता इस क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए तिब्बत के कैलाश एवं मानसरोवर के समान है। (2) शिव मंदिरः कांगड़ा जिले के काठगढ़ में। (3) किन्नौर कैलाश या किन्नर कैलाशः किन्नौर जिले में स्थित पर्वत जिसे शैव एवं बौद्ध पवित्र मानते हैं। (4) बिजली महादेवः कुल्लू से लगभग 8 किलोमीटर दूर खराल घाटी में। (5) त्रिलोकीनाथः कुल्लू जिले में कुल्लू से मनाली होते हुए रोहतांग से लगभग 8 किलोमीटर दूर। निकट ही चन्द्रा और भागा नदियों का संगम तथा व्यास नदी का उद्गम। (6) त्रिलोकीनाथ, (7) भूतनाथ एवं (8) अर्द्ध-नारीश्वरः ये तीनों मंदिर मंडी जिले में। (9) जटोलीः सोलन जिले में।
(9) उत्तर प्रदेशः
वाराणसी के ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ के अतिरिक्त निम्न मंदिरों का उल्लेख किया जा सकता है – (1) नया काशी विश्वनाथः वाराणसी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में। (2) जंगलीनाथः बहराइच में। (3) लोधेश्वर महादेवः बाराबंकी के रामनगर में। (4) गोकर्णनाथः लखीमपुर-खीरी जिले के गोला-गोकर्णनाथ में। यह तहसील-स्तर का शहर है जो सरैंया नदी के तट पर स्थित है। (5) बाबा भांडेश्वरनाथः चंदौली जिले के माटीगाँव में।(6) सकहा शंकरः हरदोई में।
(10) राजस्थानः
(1)एकलिंगजीः उदयपुर से 22 किलोमीटर दूर। (2) शिव मंदिरः बांसवाड़ा की गढ़ी तहसील के परतापुर में। (3) सोमनाथः पाली जिले के पाली शहर में।(4) निम्बो का नाथः पाली जिले में फालना के पास। (5) परशुराम महादेवः पाली जिले में सदरीनगर से 14 किलोमीटर दूर। (6) हर्षनाथः सीकर से लगभग 10 किलोमीटर दूर हर्षगिरि पहाड़ी की तलहटी के गाँव में।
(11) गुजरातः
सोमनाथ एवं नागेश्वर के अतिरिक्त निम्न मंदिर उल्लेखनीय हैः (1) पिंपलेश्वर महादेवः मेहसाणा जिले में सालदी के पास। (2) उत्कंठेश्वर महादेवः खेड़ा जिले में। (3) महादेवः भारुच जिले में। (4) कोटेश्वरः कच्छ जिले के लखपत के पास।
(12) महाराष्ट्रः
महाराष्ट्र एक मात्र ऐसा राज्य है जहाँ चार ज्योतिर्लिंगों की मान्यता है। (1) त्र्यम्बकेश्वर (2) घुश्मेश्वर (3) भीमशंकर (4) औंढ़ा नागनाथ। इनके अलावा औरंगाबाद से 50 किलोमीटर दूर वेरुल में विश्वप्रसिद्ध एलोरा की गुफा संख्या 16 विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कैलाश मंदिर का पूरा परिसर दर्शनीय है जिसमें योगीश्वर, नटराज, त्रिमूर्ति एवं नन्दी की आकृतियाँ चित्ताकर्षक हैं। मुम्बई हार्बर से लगभग 10 किलोमीटर दूर विश्वप्रसिद्ध एलिफेंटा (घारापुरीची) के पश्चिमी भाग की मुख्य गुफा में शिव का वैभव दर्शनीय है।
(13) गोवाः
(1) शिव मंदिरः पणजी से 60 किलोमीटर दूर ताबड़ीसुर्ल गाँव में।
(14) ओडिशाः
तमिलनाडु के वर्णित रामेश्वरम् एवं क्रमांक 1 से लेकर क्रमांक 11 तक के मंदिरों के अलावा ओडिशा के भुबनेश्वर का लिंगराज मंदिर भी विश्व प्रसिद्ध है। लिंगराज मंदिर के अलावा भुबनेश्वर के ही आस-पास सैंकड़ों शिव मंदिर मौजूद हैं। राजारानी मंदिर का स्थापत्य भी बेजोड़ है। मुक्तेश्वर,घंटेश्वर, परसुरामेश्वर,कपिलेश्वर, गंगेश्वर तथा गुप्तेश्वर मंदिर भी चर्चित हैं। भारत में भुबनेश्वर शहर एवं उसके चतुर्दिक अन्य किसी शहर की अपेक्षा शिव मंदिरों की संख्या सर्वाधिक है। भुबनेश्वर के अलावा कटक से लगभग 37 किलोमीटर दूर महानदी में स्थित द्वीप में धबलेश्वर(धनल अर्थात श्वेत) भी दर्शनीय है। ओडिशा के अन्य स्थानों के प्रसिद्ध शिव मंदिर निम्न हैः
(1)भद्रक जिले के भद्रक से 37 किलोमीटर दूर अखंडलमनि मंदिर
(2) ढ़ेंकानल जिले में कपिलाश पर्वत की चोटी पर स्थित चंद्रशेखर मंदिर। ढ़ेंकानल से लगभग 20 किलोमीटर दूर नागनाथेश्वर मंदिर। ढ़ेंकानल से 32 किलोमीटर दूर ब्राह्मनी नदी के तट पर करमुला में आठ शिव मंदिर हैं, जो अष्टशंभू के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें कनकेश्वर अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध है।
(3) संबलपुर जिले के संबलपुर से 23 किलोमीटर दूर महानदी के तट पर हूमा मंदिर ।
(15) असमः
(1)उमानन्द मंदिरःगोवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य स्थित पीकॉक आइलैंड में। (2) शिव डोलः शिवसागर में। (3) गोपेश्वर पहाड़ः कामरूप जिले के देउदुआर में। मान्यता है कि यहाँ शिव पधारते थे।
(16) सिक्किमः
(1) किराटेश्वर महादेवः पश्चिम सिक्किम में रंगीत नदी के तट पर तेगशिप में।
(17) पश्चिम बंगालः
हुबली जिले के चन्दननगर प्रखंड के तारकेश्वर नगर का तारकनाथ मंदिर इस राज्य में शैव मत का सर्वाधिक लिंग को संसार का सबसे बड़ा शिवलिंग होने का दावा करते हैं। (3) पहाड़ी मंदिरः राँची में राँची-हिल की चोटी पर।
(19) जम्मू-कश्मीरः
अमरनाथ की गुफा के बर्फानी बाबा (स्वयंभू हिमानी शिवलिंग)। आषाढ़ पूर्णिमा से आरम्भ होकर रक्षाबंधन तक सम्पन्न होनेवाली अमरनाथ यात्रा में लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।
भारतेतर देशों मेः
(1) तिब्बत क्षेत्रः
(1) मानसरोवर एवं (2) कैलाश पर्वत
(2) नेपालः
(1) पशुपतिनाथ मंदिरः काठमांडु में बागमती नदी के तट पर।(2) डोलेश्वर महादेवः भक्तपुर में।(3) कैलाशनाथ महादेवः काठमांडु के पास पर्वत पर। नेपाल में मान्यता है कि यह संसार की सबसे ऊँची प्रतिमा है।
(3) पाकिस्तानः
(1) कटासराज मंदिरः पंजाब प्रांत के चकवाल जिले में।
(4) बंगलादेशः
(1) कालभैरव मंदिरः बंगलादेश में।
(5) श्रीलंकाः
(1) कोनेश्वरम् एवं (2) कीथीस्वरम् मंदिर
(6) दक्षिण-अफ्रीकाः
जोहांसबर्ग में संसार की सबसे ऊँची शिव-शक्ति की प्रतिमा की स्थापना हुई है। समाचार-पत्रों की रिपोर्ट के अनुसार इसकी ऊँचाई 20 मीटर है तथा इसे बनाने में 90 टन स्टील लगा है।



सुबह शाम भगतो पुकारो बाबा का नाम


सुबह शाम भगतो पुकारो बाबा का नाम ,
रोज करो चरणों में बाबा को प्रणाम,
दुनियां में सच्चा है बाबा का नाम ,
बाबा का नाम तुम्हें दुनियां से क्या काम ,
सुबह शाम भगतो पुकारो बाबा का नाम
हो कौन जाने बाबा कब आ जाए,
जब बाबा आए तो दुःख हर जाए ,
बाबा का लो नाम तुम्हें दुनिया से क्या काम,
सुबह शाम भगतो पुकारो बाबा का नाम,
हो कौन जाने ये जीवन कब ढल जाये,
क्यों न दो पल बाबा के चरणों में बिताए,
कियों न हम करलें बाबा का ध्यान ,
बाबा का लो नाम तुम्हें दुनिया से क्या काम,
सुबह शाम भगतो पुकारो बाबा का नाम
जय भोले बाबा
 —

मेवाड़ का अमरनाथ – परशुराम महादेव गुफा मंदिर : हर हर बम बम


सावन ( आशूतोष ) मास के दूसरे दिन पर आप को ले चलते है मेवाड़ का अमरनाथ – परशुराम महादेव गुफा मंदिर :
हर हर बम बम 

परशुराम महादेव गुफा मंदिर - मेवाड़ का अमरनाथ : अरावली की प्राचीन पहाड़ियों में स्थित एक गुफा मंदिर है 
स्वंय परशुराम ने फरसे से चट्टान को काटकर किया था निर्माण !

टांगीनाथ धाम - जहाँ पर है भगवान परशुराम का फरसा अरावली की सुरम्य पहाड़ियों में स्तिथ परशुराम महादेव गुफा मंदिर का निर्माण स्वंय परशुराम ने अपने फरसे से चट्टान को काटकर किया था। इस गुफा मंदिर तक जाने के लिए 500 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। इस गुफा मंदिर के अंदर एक स्वयं भू शिवलिंग है जहां पर विष्णु के छठे अवतार परशुराम ने भगवान शिव की कई वर्षो तक कठोर तपस्या की थी। तपस्या के बल पर उन्होंने भगवान शिव से धनुष, अक्षय तूणीर एवं दिव्य फरसा प्राप्त किया था।
हैरतअंगेज वाली बात यह है कि पूरी गुफा एक ही चट्टान में बनी हुई है। ऊपर का स्वरूप गाय के थन जैसा है। प्राकृतिक स्वयं-भू लिंग के ठीक ऊपर गोमुख बना है, जिससे शिवलिंग पर अविरल प्राकृतिक जलाभिषेक हो रहा है। मान्यता है कि मुख्य शिवलिंग के नीचे बनी धूणी पर कभी भगवान परशुराम ने शिव की कठोर तपस्या की थी। इसी गुफा में एक शिला पर एक राक्षस की आकृति बनी हुई है। जिसे परशुराम ने अपने फरसे से मारा था।
दुर्गम पहाड़ी, घुमावदार रास्ते, प्राकृतिक शिवलिंग, कल-कल करते झरने एवं प्राकृतिक सौंदर्य से ओत-प्रोत होने के कारण भक्तों ने इसे मेवाड़ के अमरनाथ का नाम दे दिया है।
कहां स्थित है :
परशुराम महादेव का मंदिर राजस्थान के राजसमन्द और पाली जिले की सीमा पर स्तिथ है। मुख्य गुफा मंदिर राजसमन्द जिले में आता है जबकि कुण्ड धाम पाली जिले में आता है। पाली से इसकी दुरी करीब 100 किलोमीटर और विशव प्रसिद्ध कुम्भलगढ़ दुर्गसे मात्र 10 किलोमीटर है।
इसकी समुद्र ताल से उचाई3600 फ़ीट है। यहाँ से कुछ दूर सादड़ी क्षेत्र में परशुराम महादेव की बगीची है। गुफा मंदिर से कुछ ही मील दूर मातृकुंडिया नामक स्थान है जहां परशुराम को मातृहत्या के पाप से मुक्ति मिली थी । इसके अलावा यहां से 100 किमी दूर पर परशुराम के पिता महर्षि जमदगनी की तपोभूमि है।
स्थान से जुडी है कई मान्यता :
इस स्थान से जुडी एक मान्यता के अनुसार भगवान बद्रीनाथ के कपाट वही व्यक्ति खोल सकता है जिसने परशुराम महादेव के दर्शन कर रखे हो।

वाराणसी :- काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हर हर बम बम !

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सावन ( आशूतोष ) मास के चौथे दिन पर हम आपको भ्रमण पर ले चलते है वाराणसी :- काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हर हर बम बम !
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गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित वाराणसी नगर विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक माना जाता है तथा यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में सुशोभित है। इस नगर के हृदय में बसा है भगवान काशी विश्वनाथ का मंदिर जो प्रभु शिव, विश्वेश्वर या विश्वनाथ के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।ऐसा माना जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब प्रकाश की पहली किरण काशी की धरती पर पड़ी थी। तभी से काशी ज्ञान तथा आध्यात्म का केंद्र माना जाता है।

यह भी माना जाता है कि निर्वासन में कई साल बिताने के पश्चात भगवान शिव इस स्थान पर आए थे और कुछ समय तक काशी में निवास किया था। ब्रह्माजी ने उनका स्वागत दस घोड़ों के रथ को दशाश्वमेघ घाट पर भेजकर किया था। काशी विश्व नाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्टर स्थाशन है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्ना न कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्वा मी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वांमी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ हैं ! हिन्दू धर्म में कहते हैं कि प्रलयकाल में भी इसका लोप नहीं होता। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली भी यहीं भूमि बतलायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने का कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होने सारे की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और इन्हीं की अर्चना से श्रीवशिष्ठजी तीनों लोकों में पुजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाये ! यह मंदिर प्राक्-ऐतिहासिक काल में निर्मित हुआ था। सन् 1776 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने इस मंदिर के पुनर्निमाण के लिए काफी धनराशि दान की थी। यह भी माना जाता है कि लाहौर के महाराजा रंजीतसिंह ने इस मंदिर के शिखर के पुनर्निमाण के लिए एक हजार किलो सोने का दान किया था। 1983 में उत्तरप्रदेश सरकार ने इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया और पूर्व काशी नरेश विभूति सिंह को इसके ट्रस्टी के रूप में नियुक्त किया।
सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलानाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन से छुट जाता है, चाहे मृत-प्राण्ाी कोई भी क्यों न हो। मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवंम दुखों परिपीड़ित जनों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है। विश्वेश्वर के आनंद-कानन में पांच मुख्य तीर्थ हैं:-
• दशाश्वेमघ घाट ,
• लोलार्ककुण्ड,
• बिन्दुमाधव,
• केशव और
• मणिकर्णिका
और इनहीं से युक्त यह अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है ! स्त्री हो या पुरुष, युवा हो या प्रौढ़, हर कोई यहाँ पर मोक्ष की प्राप्ति के लिए जीवन में एक बार अवश्य आता है। ऐसा मानते हैं कि यहाँ पर आने वाला हर श्रद्धालु भगवान विश्वनाथ को अपनी ईष्ट इच्छा समर्पित करता है।
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उज्जैन:- पृथ्वी की नाभि में बसा है महाकालेश्वर मंदिर !

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सावन ( आशूतोष ) मास के पाँचवे  दिन पर हम आपको भ्रमण पर ले चलते है उज्जैन:- पृथ्वी की नाभि में बसा है महाकालेश्वर मंदिर !
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  बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हर हर बम बम !
पृथ्वी की नाभि कहा जाने वाला उज्जैन शहर तीर्थ स्थल के रूप में विश्व विख्यात है। क्षिप्रा नदी के किनारे बसा यह शहर कभी महाराजा विक्रमादित्य के राज्य की राजधानी था। हिंदुओं के लिए यह शहर पवित्र माना जाता है। यहां पर द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक महाकालेश्वर ज्योतिर्लिग  स्थापित है। यह जगह हिंदू धर्म की 7 पवित्र पुरियों में से एक है। भारत के 51 शक्तिपीठों और चार कुंभ क्षेत्रों में एक जगह उज्जैन है। यहां हर 12 साल में पूर्ण कुंभ मेला तथा हर 6 साल में अ‌र्द्धकुंभ मेला लगता है।सावन के पावन महीने में पूरा देश बोलबम के जयकारे के साथ भगवान शंकर की भक्ति में लीन हो जाता है। इस दौरान भक्तजन बाबा भोले के दर्शन के लिए कई मील की दूरी का सफर करते हैं। ऐसी ही एक जगह है धर्म और आस्था की नगरी उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, जहां हर साल सावन के महीने में लाखों की संख्या में लोग भगवान शिव की आराधना के लिए पहुंचते हैं।
महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है। इस मंदिर को मध्य भारत की भव्यता का प्रतीक माना जाता है। इसकी भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर के बारे में लिखा गया है।
पौराणिक कथा:-
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिग की स्थापना से संबंधित भारतीय पुराणों के अलग-अलग कथाओं में इसका वर्णन मिलता है। एक कथा के अनुसार एक बार अवंतिका नाम के राज्य में राजा वृषभसेन नाम के राजा राज्य करते थे। राजा वृषभसेन भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। अपने दिन का अधिकतर समय वह भगवान शिव की पूजा-अर्चना में लगाते थे।
एक बार पड़ोसी राजा ने वृषभसेन के राज्य पर हमला बोल दिया। वृषभसेन ने पूरे साहस के साथ इस युद्ध का सामना किया और युद्ध को जीतने में सफल रहे। अपनी हार का बदला लेने के लिए पड़ोसी राजा ने वृषभसेन को हराने के लिए कोई और उपाय सोचा। इसके लिए उसने एक असुर की सहायता ली। उस असुर को अदृश्य होने का वरदान प्राप्त था। पड़ोसी राजा ने असुरों की सहायता से अवंतिका राज्य पर फिर हमला बोल दिया। इन हमलों से बचने के लिए राजा वृषभसेन ने भगवान शिव की शरण ले ली।
अपने भक्तों की पुकार सुनकर भगवान शिव साक्षात अवंतिका राज्य में प्रकट हुए। उन्होंने पड़ोसी राजा और असुरों से प्रजा की रक्षा की। इस पर राजा वृषभसेन और प्रजा ने भगवान शिव से अंवतिका राज्य में ही रहने का आग्रह किया, जिससे भविष्य में अन्य किसी आक्रमण से बचा जा सके। अपने भक्तों के आग्रह को सुनकर भगवान शिव वहां ज्योतिर्लिग के रूप में प्रकट हुए।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिग का इतिहास बताता है कि इस मंदिर का 1234 ई। में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने आक्रमण करके विध्वंस कर दिया लेकिन बाद में यहां के शासकों ने इसका पुन: जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण किया।