बुधवार, 16 सितंबर 2015

चंद्रशेखराकम हिंदी अर्थ सहित





चंद्रशेखराकम 
चंद्रशेखर  चंद्रशेखर  चंद्रशेखर  पाहि माम् !
चंद्रशेखर  चंद्रशेखर  चंद्रशेखर  रक्ष माम् !!

कोई भक्त भवानीपति भालचन्द्र भगवान् शिव को अपना अनन्यशरण मानता हुआ, मस्तक पर जिनके चन्द्रमाविराजमान है, इस प्रकार के चन्द्रशेखर भगवान् शिव को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि, हे चन्द्रशेखर प्रभो मेरी रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, मैं एकमात्रा आपकी शरण में हूँ। यहाँ सम्बोधन में बहुत्व की वीप्सा भक्त की अनन्यशरणता को सूचित करती है।

रत्नासानुशरासनं रजताशिृनिकेतनम् !
सिनिीकृतपगेरमच्युतायनसायकम् !!
क्षिप्रदग्ध्पुरत्रायं त्रिादिवालयैरभिवन्दितम् !
चंद्रशेखर माश्रये मम क करिष्यति वै यम !!

हिमालय में जिनका निवास है, जिन्होंने सुमेरु पर्वत को धनुष और वासुकि सर्प की प्रत्यंचायानि धनुष  की डोरी तथा भगवान् विष्णु को वाण बनाकर त्रिपुर का दाह किया है, अतएवदेवताओं ने भी जिनकी वन्दना की है, ऐसे चन्द्रशेखर भगवान् शिव का आश्रय लेता हूँ, तबयमराज भी मेरा क्या कर लेगा अर्थात् यह सर्ववदित है कि चन्द्रशेखर भगवान् का आश्रयलेने पर यमराज मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।

पपादपपुष्पगन्ध्पदाम्बुजद्वयशोभितम्
भाललोचनजातपावकदग्ध्मन्मथ्रपिग्रहम् !
भस्मदिग्ध्कलेवरं भवनाशनं भवमव्ययम्
चंद्रशेखर माश्रये !!

मैं उस भगवान् चन्द्रशेखर का आश्रय लेता हूँ, जिनके चरणकमल मन्दारादि पाँच देवपादपों के पुष्पों से सुगन्धि्त हैं, और जिनके भाल में स्थित तृतीय लोचनाग्नि के द्वारा कामदेव का कलेवर भस्म हो गया था, और स्वयं जो भस्म रमाये हुए हैं, इस संसार को प्रलयकाल में जो न कर देते हैं, अथवा जिनकी आराधना से भक्त को फिर इस संसार में नहीं आना पड़ता है, अर्थात् जो मोक्ष को प्रदान करते हैं, स्वयं जो इस संसार के कारण भी हैं, यह सब होते हुए भी जो अक्षयअमर व शांत हैं।

मत्तवारणमुख्यचर्मकृत्तोत्तरीयमनोहरम् !
पजासनपालोचन पूजितांघ्रिसरोरुहम् !!
देवसिन्ध्ुतरसीकरसित्तफशुभ्रजटाध्रम् !
चंद्रशेखर माश्रये !!

मैं ऐसे भगवान् चन्द्रशेखर का आश्रय लेता हूँ, जिन्होंने गजराज के चर्म का उत्तरीय दुपाबनाया है, इससे भी जो मनोहर ही मालूम पड़ते हैं, और पद्मासनब्रा और कमलनमन वष्णु केद्वारा जिनके चरणकमल सर्वदा वन्दनीय हैं, तथा जिनकी जटायें, मन्दाकिनी के तरों केजलकणों से, स्वच्छ दिखाई दे रही है।

यक्षराजसखं भगगाक्षहरं भुजविभूषणम् !
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम !!
क्ष्वेडनीलगलं परध्धरिणं मृगधरिणम् !
चंद्रशेखर माश्रये !!

मैं ऐसे भगवान् चन्द्रशेखर का आश्रय लेता हूँ, जो यक्षराज कुबेर के सखा मित्रा है, और इन्द्र के भगाक्षरुप दोष को दूर करने वाले हैं, भुज का भूषण बनाए हुए हैं, और शैलराजसूता माता पार्वती से समालिति है वामभाग जिनका, देवताओं के कल्याणार्थ समुद्रमन्थन के अवसर पर जिन्होंने विषपान कर लिया था, इसी के कारण जिनका कण्ठ नीलवर्ण का हो गया है, जो परशु आदि आयुधें को धरण करते हैं तथा मृगलाछनचन्द्र को भी धरण करते हैं।

कुण्डलीकृतकुण्डलेरकुण्डलं वृषवाहनम् !
नारदादिमुनीरस्तुतिवैभवं भुवनेरम् !!
अन्ध्कान्ध्कमाश्रितामरपादपं शमनान्तकम् !
चंद्रशेखर माश्रये !!

मैं ऐसे भगवान् चन्द्रशेखर का आश्रय लेता हूँ, जिन्होंने कुण्डलाकार वासुकि सर्पराज का कर्णाभरण बनाया है, और बूढा बैल जिनका वाहन है, तथा नारदादि मुनीयो के द्वारा जिनके वैभव की स्तुति की गई है, जो सारे भुवनों के ईश्वर हैं, अथवा उड़ीसा में स्थित भुवनेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हैं। अन्ध्कासुर तथा वृष्णिवंश ने अमरपादपरूप में जिसका आश्रय लिया हुआ है, जो शमनयमराज के भी अन्तक हैं।

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणम् !
दक्षयज्ञविनाशनं त्रिागुणात्मकं त्रिाविलोचनम् !!
भुत्तिफमुत्तिफपफलप्रदं सकलाघसनिबर्हणम् !
चंद्रशेखर माश्रये !!

मैं ऐसे भगवान् चन्द्रशेखर का आश्रय लेता हूँ, जो इस संसार रूपी रोग के लिए औषध् हैं, और समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं, जिन्होंने दक्षप्रजापति के यज्ञ का विध्वंश किया है, जो सत्व, रजस व तमो गणात्मक है, अर्थात् स्थिति की अवस्था में जो सत्वरूप धारण करते हैं, और उत्पत्ति की अवस्था में जो रजोगुणरूप धारण करते हैं, और संहार की अवस्था में जो धारण का रूप धरण करते हैं। लोकविलक्षण जिनके तीन लोचन हैं, जो मुक्ति  व मुक्तिरूप फल को प्रदान करते हैं, और भक्तो के समस्त पापजन्य ताप को दूर कर देते हैं।

भत्तफवत्सलमखचत निध्मिक्षयं हरिदम्बरम् !
सर्वभूतपत परात्परमप्रमेयमनुत्तमम् !!
सोमवारिदभूहुताशनसोमपानिलवाकृतिम् !
चंद्रशेखर माश्रये !!

मैं ऐसे भगवान् चन्द्रशेखर का आश्रय लेता हूँ, जो भक्तवत्सल हैं, और भक्तो से पूजित हैं, तथा अक्षयनिधि् के समान हैं, जो दिगम्बर हैं, सभी भूतों प्राणियों के स्वामी हैं, सबसे श्रेष्ठ, अप्रमेय जिनके विषय में किसी रूप व गुणादि को लेकर इदमिथ्या निर्णय नहीं किया जा सकता है, जिनको प्राप्त कर फिर  आगे किसी पदार्थ को पाने की इच्छा ही नहीं होती है, अर्थात् ये ही प्राप्तव्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ है, और जो सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाशादि आठ रूपों में विराजमान हैं।

विसृिविधयिनं पुनरेव पालनतत्परम् !
संहरन्तमपि प्रपमशेषलोकनिवासिनम् !!
कीडयन्तमहखनशं गणनाथयूथसमन्वितम् !
चंद्रशेखर माश्रये !!

मैं ऐसे भगवान् चन्द्रशेखर का आश्रय लेता हूँ, जो रजोगुण समन्वित होकर समस्त संसार की रचना करते हैं, और फिर सत्वगुण का आश्रय लेकर इस संसार का पालन करते हैं, तथा अन्त में तमोगुण का आश्रय लेकर जो अखिल प्रपच का संहार करते हैं, संसार की स्थिति में जो समस्त प्राणियों को तत्वप्राणी के कर्मानुसार नचाते रहते हैं, तथा जो गणपति के गणों के मय विराजमान हैं।

मृत्युभीतमृकण्डुसूनुकृतस्तवं शिवसधिै !
यत्रा कुत्रा च य: पठेहि तस्य मृत्युभयं भवेत् !!
पूर्णमायुमरोगितामखिलार्थसम्पदमादरम् !
चंद्रशेखर  एव तस्य ददाति मुत्तिफमयन्तत: !!

जो भक्त, मृत्यु से भयभीत र्माकण्डेय मुनि के द्वारा रचित इस स्तोत्र का जहाँ कहीं भी भगवान् शिव के मन्दिर में, या उसके निकट पाठ करता है, वह पूर्ण आयु, आरोग्य, सभी प्रकार की सम्पत्तियों को, तथा आदर को प्राप्त करता है। स्वयं भगवान् चन्द्रशेखर ही उसको सहज में मुक्ति प्रदान करते हैं।


सोमवार, 7 सितंबर 2015

महादेव





·         महादेव कल्याणकारी होने के कारण शिव कहलाते हैं तथा
·         रू (दु:ख) का नाम करने के कारण रुद्र नाम से अभिहित हैं। वे प्रसन्न भी शीघ्र होते हैं और रुष्ट भी। एक बार शिव दक्ष पर कुपित हो गये थे। उन्होंने विधि-विधान से किये जाने वाले यज्ञ को तथा प्रकृति के समस्त मूल तत्त्वों को नष्ट कर डाला। पूषा [1] पर आक्रमण किया। वह पुरोडाश (यव, तंडुल) खा रहा था। शिव ने उसके समस्त दांत तोड़ डालें। देवताओं आदि ने भयभीत होकर शिव की शरण ग्रहण की, तब यज्ञ पूर्ण हो पाया।
·         पूर्वकाल में तीन असुरों ने आकाश में तीन नगरों का निर्माण किया:
1. लोहे का- विद्युन्माली के अधिकार में,
2. चांदी का- तारकाक्ष के अधिकार में तथा
3. सोने का- कमलाक्ष के अधिकार में था।
·         इन्द्र अनेक प्रयत्नों के उपरांत भी उन पर विजय प्राप्त न कर पाया, तो उसने शिव की शरण ग्रहण की। शिव ने गंधमादनऔर विंध्याचल को रथ की पार्श्ववर्ती दो ध्वजाओं के रूप में ग्रहण किया। पृथ्वी को रथ, शेष को रथ का धुराचंद्र-सूर्य को पहिये, एलपत्र के पुत्र और पुष्पदंत को जुए की कीलें बनाया, मलयाजल को यूपतक्षक को जुआ बांधने की रस्सीवेदों को घोड़े तथा उपवेदों को लगाम और गायत्री तथा सावित्री को प्रग्रह बना लिया। तदुपरांत ओंकार को चाबुकब्रह्मा को सारथीमंदराचल को गांडीववासुकि नाग को प्रत्यंचाविष्णु को उत्तम बाणअग्नि को बाण का फलवायु को उसके पंख तथा वैवस्वत यम को उसकी पूंछ बनाकर मेरूपर्वत को प्रधान ध्वजा का स्थान दिया। इस प्रकार घमासान युद्ध के लिए कटिबद्ध हो शिव ने त्रिपुर पर आक्रमण कर उन्हें विदीर्ण कर डाला। उसी समय पार्वती एक पांच शिखा वाले बालक को गोद में लेकर देवताओं के सम्मुख आयीं और पूछने लगीं कि क्या वे लोग उस बालक को पहचानते हैं? इन्द्र ने बालक पर वज्र से प्रहार करना चाहा, पर हंसकर शिव ने उनकी भुजा स्तंभित कर दी। इन्द्र सहित समस्त देवता ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने बताया कि पार्वती को प्रसन्न करने के निमित्त बाल रूप में शिव ही थे। वे एक होकर भी अनेक रूपधारी हैं। उनकी आराधना करने से इन्द्र की बांह पूर्ववत ठीक हो पायी। शिव का व्यक्तित्व विशाल है, अनेक आयामों से देखकर उनके अनेक नाम रखे गये हैं:
1. महेश्वर- महाभूतों के ईश्वर होने के कारण तथा सूंपूर्ण लोकों की महिमा से युक्त।
2. बडवामुख- समुद्र में स्थित मुख जलमय हविष्य का पान करता है।
3. अनंत रुद्र- यजुर्वेद में शतरूप्रिय नामक स्तुति है।
4. विभु और प्रभु- विश्व व्यापक होने के कारण।
5. पशुपति- सर्पपशुओं का पालन करने के कारण।


शनिवार, 5 सितंबर 2015

भगवान शिव जी की आरती



भगवान शिव जी की आरती

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं |
सदा वसन्तं ह्रदयाविन्दे भंव भवानी सहितं नमामि ॥


जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा |
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
एकानन चतुरानन पंचांनन राजे |
हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें |
तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड़मालाधारी |
चंदन, मृदमग सोहें, भाले शशिधारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें |
सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगें॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
कर के मध्य कमड़ंल चक्र, त्रिशूल धरता |
जगकर्ता, जगभर्ता, जगससंहारकर्ता ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका |
प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी |
नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा......
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें |
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें ॥
ॐ जय शिव ओंकारा.....
जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा......




शिव के कुछ पर्यायवाची नाम


शिव के कुछ पर्यायवाची नाम


वेदों, पुराणों और उपनिषदों में अनेक नामों से शिव की महिमा गाई गई है। उनमें से कुछ नाम यहाँ उद्धृत किए जा रहे हैं : 

रुद्र , शिव , अंगीरागुरु , अंतक , अंडधर , अंबरीश , अकंप , अक्षतवीर्य , अक्षमाली , अघोर , अचलेश्वर , अजातारि , अज्ञेय , अतीन्द्रिय , अत्रि , अनघ , अनिरुद्ध , अनेकलोचन , अपानिधि , अभिराम , अभीरु , अभदन , अमृतेश्वर , अमोघ , अरिदम , अरिष्टनेमि , अर्धेश्वर , अर्धनारीश्वर , अर्हत , अष्टमूर्ति , अस्थिमाली , आत्रेय , आशुतोष , इंदुभूषण , इंदुशेखर , इकंग , ईशान , ईश्वर , उन्मत्तवेष , उमाकांत , उमानाथ , उमेश , उमापति , उरगभूषण , ऊर्ध्वरेता , ऋतुध्वज , एकनयन , एकपाद , एकलिंग , एकाक्ष , कपालपाणि , कमंडलुधर , कलाधर , कल्पवृक्ष , कामरिपु , कामारि , कामेश्वर , कालकंठ , कालभैरव , काशीनाथ , कृत्तिवासा , केदारनाथ , कैलाशनाथ , क्रतुध्वसी , क्षमाचार , गंगाधर , गणनाथ , गणेश्वर , गरलधर , गिरिजापति , गिरीश , गोनर्द , चंद्रेश्वर , चंद्रमौलि , चीरवासा , जगदीश , जटाधर , जटाशंकर , जमदग्नि , ज्योतिर्मय , तरस्वी , तारकेश्वर , तीव्रानंद , त्रिचक्षु , त्रिधामा , त्रिपुरारि , त्रियंबक , त्रिलोकेश , त्र्यंबक , दक्षारि , नंदिकेश्वर , नंदीश्वर , नटराज , नटेश्वर , नागभूषण , निरंजन , नीलकंठ , नीरज , परमेश्वर , पूर्णेश्वर , पिनाकपाणि , पिंगलाक्ष , पुरंदर , पशुपतिनाथ , प्रथमेश्वर , प्रभाकर , प्रलयंकर , भोलेनाथ , बैजनाथ , भगाली , भद्र , भस्मशायी , भालचंद्र , भुवनेश , भूतनाथ , भूतमहेश्वर , भोलानाथ , मंगलेश , महाकांत , महाकाल , महादेव , महारुद्र , महार्णव , महालिंग , महेश , महेश्वर , मृत्युंजय , यजंत , योगेश्वर , लोहिताश्व , विधेश , विश्वनाथ , विश्वेश्वर , विषकंठ , विषपायी , वृषकेतु , वैद्यनाथ , शशांक , शेखर , शशिधर , शारंगपाणि , शिवशंभु , सतीश , सर्वलोकेश्वर , सर्वेश्वर , सहस्रभुज , साँब , सारंग , सिद्धनाथ , सिद्धीश्वर , सुदर्शन , सुरर्षभ , सुरेश , सोम , सृत्वा , हर-हर महादेव , हरिशर , हिरण्य , हुत  आदि ।


इस मंत्र से शिव पूजा कर दूर करें पैसों की परेशानी


इस मंत्र से शिव पूजा कर दूर करें पैसों की परेशानी
मन्दारमालाङ्कुलितालकायै कपालमालांकितशेखराय।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।।
श्री अखण्डानन्दबोधाय शोकसन्तापहारिणे।
सच्चिदानन्दस्वरूपाय शंकराय नमो नम:॥
शास्त्रों में मनोरथ पूर्ति व संकट मुक्ति के लिए अलग-अलग तरह की धारा से शिव का अभिषेक करना शुभ बताया गया है। अलग-अलग धाराओं से शिव अभिषेक का फल- जब किसी का मन बेचैन हो, निराशा से भरा हो, परिवार में कलह हो रहा हो, अनचाहे दु:ख और कष्ट मिल रहे हो तब शिव लिंग पर दूध की धारा चढ़ाना सबसे अच्छा उपाय है।
इसमें भी शिव मंत्रों का उच्चारण करते रहना चाहिए -
·      वंश की वृद्धि के लिए शिवलिंग पर शिव सहस्त्रनाम बोलकर घी की धारा अर्पित करें। -
·      शिव पर जलधारा से अभिषेक मन की शांति के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। -
·      भौतिक सुखों को पाने के लिए इत्र की धारा से शिवलिंग का अभिषेक करें। -
·      बीमारियों से छुटकारे के लिए शहद की धारा से शिव पूजा करें। गन्ने के रस की धारा से अभिषेक करने पर हर सुख और आनंद मिलता है।
·      सभी धाराओं से श्रेष्ठ है गंगाजल की धारा। शिव को गंगाधर कहा जाता है। शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से शिव अभिषेक करने पर चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। इससे अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए। 


शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

लिंगाष्टकम ( हिंदी अर्थ सहित )


लिंगाष्टकम
लिंगाष्टकम ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं निर्मलभाषितशोभित लिंग ! जन्मजदुःखविनाशक लिंग तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं !!१!!

मैं उन सदाशिव लिंग को प्रणाम करता हूँ जिनकी ब्रह्मा, विष्णु एवं देवताओं द्वारा अर्चना की जाति है, जो सदैव निर्मल भाषाओं द्वारा पुजित हैं तथा जो लिंग जन्म-मृत्यू के चक्र का विनाश करता है (मोक्ष प्रदान करता है)

देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं, कामदहं करुणाकर लिंगं !
रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं !!२!!

देवताओं और मुनियों द्वारा पुजित लिंग, जो काम का दमन करता है तथा करूणामयं शिव का स्वरूप है, जिसने रावण के अभिमान का भी नाश किया, उन सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।

सर्वसुगंन्धिसुलेपित लिंगं, बुद्धिविवर्धनकारण लिंगं !
सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं !!३!!

सभी प्रकार के सुगंधित पदार्थों द्वारा सुलेपित लिंग, जो कि बुद्धि का विकास करने वाल है तथा, सिद्ध- सुर (देवताओं) एवं असुरों सबों के लिए वन्दित है, उन सदाशिव लिंक को प्रणाम।

कनकमहामणिभूषित लिंगं, फणिपतिवेष्टितशोभित लिंगं ! दक्षसुयज्ञविनाशन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं !!४!!

स्वर्ण एवं महामणियों से विभूषित, एवं सर्पों के स्वामी से शोभित सदाशिव लिंग जो कि दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले है ; आपको प्रणाम।

कुंकुमचंदनलेपित लिंगं, पंङ्कजहारसुशोभित लिंगं ! संञ्चितपापविनाशिन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं !!५!!

कुंकुम एवं चन्दन से शोभायमान, कमल हार से शोभायमान सदाशिव लिंग जो कि सारे संञ्चित पापों से मुक्ति प्रदान करने वाला है, उन सदाशिव लिंग को प्रणाम ।

देवगणार्चितसेवित लिंग, भवैर्भक्तिभिरेवच लिंगं !
दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं !!६!!

आप सदाशिव लिंग को प्रणाम जो कि सभी देवों एवं गणों द्वारा शुद्ध विचार एवं भावों द्वारा पुजित है तथा जो करोडों सूर्य सामान प्रकाशित हैं।

अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं, सर्वसमुद्भवकारण लिंगं !
अष्टदरिद्रविनाशित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं !!७!!

आठों दलों में मान्य, एवं आठों प्रकार के दरिद्रता का नाश करने वाले सदाशिव लिंग सभी प्रकार के सृजन के परम कारण हैं
आप सदाशिव लिंग को प्रणाम।

सुरगुरूसुरवरपूजित लिंगं, सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगं !
परात्परं परमात्मक लिंगं, ततप्रणमामि सदाशिव लिंगं !!८!!

 देवताओं एवं देव गुरू द्वारा स्वर्ग के वाटिका के पुष्पों से पुजित परमात्मा स्वरूप जो कि सभी व्याख्याओं से परे है उन सदाशिव लिंग को प्रणाम। 


ॐ  नमः शिवाय